Artificial Intelligence (AI): अदृश्य पहलू और उनके प्रभाव (भाग-१)

IPL (Indian Premier League) , ORS (Oral Rehydration Solution),  इत्यादि कुछ ऐसे acronym हैं, जिनके full form के लिए दिमाग़ पे ज़ोर पड़ेगा। ये Acronyms Noun बन चुके हैं। AI भी इसी श्रेणी में आता जा रहा है। एक-आध पीढ़ी बाद Artificial Intelligence बहुत कम लोग याद रख पाएँगे। किसी acronym के अपने मूल शब्दों को विस्थापित या विस्मृत करने की दो शर्तें हैं। दोनों शर्तें एक साथ (AND condition) लागू होनी चाहिए। एक है शब्दों का बड़ा और उच्चारण में जटिल होना। बड़े होने के कारण उच्चारण में अधिक समय लगता है। जटिलता हमेशा भारी होती है। जिह्वा को भी भारी भरकम शब्द राह नहीं आते। इससे संचार में बाधा आती है। कानों का भी यही हाल है। उन्हें भी आसान भाषा में सुनाना पसंद है।  ऐसे में Acronym जिह्वा और कानों का काम आसान कर देता देते हैं।जैसे SP ( superintendent of Police)। दूसरी शर्त है उन शब्दों का प्रचलित होना। उसमें दम होना। प्रचलित होना प्रख्यात होने से अलग है। FIR (First Information Report) प्रचलित है, लेकिन क्या प्रख्यात है? सुनते ही एक भय छू जाता है। इन दोनों शर्तों को पूरा करने के कारण AI संक्षिप्त रूप (acronym) से संज्ञा noun) बन जाएगा। रही बात AI के प्रख्यात या कुख्यात होने की, तो यह प्रकृति तय करेगी। सुदूर समय में, कोई वस्तु यदि समाज के लिए सहायक होती है, तो वह अवश्य स्थापित रहेगी। उसका अस्तित्व बना रहेगा। Marketing Stunt और खोखले विषयवस्तु वाली चीज़ें धीमे-धीमे अस्तित्व विहीन हो जाती हैं। 

आज AI को लेकर उत्साह और रोमांच का माहौल है। एक महीनों भर शोध करके पता करने वाली विषयवस्तु AI से 15 मिनटों में व्यवस्थित होके मिल जाती है। समय अनमोल रतन है, इसकी बचत कौन नहीं करना चाहेगा! इसका दूसरा पहलू भी है: भय और असुरक्षा। बहुत सारी नौकरियों को AI खाये जा रहे हैं। जो बची हैं, उनके कैंची के मुँह में कभी भी आ जाने का डर है। जैसे-जैसे AI का इस्तेमाल बढ़ेगा, इसके अन्य पहलू सामने आते जाएँगे। हाल ही में Ford Motors ने गाड़ियों की गुणवत्ता (Quality) AI को सौंप दिया था और कई लोगों को नौकरी से विदाई दे दी थी। गुणवत्ता में गिरावट होने के कारण उन्होंने अपने लोगों को वापस बुलाया और AI पे निर्भरता को कम किया। ऐसे और बहुत सारे अच्छे, कम अच्छे पहलू सामने आएँगे, फ़िलहाल कुछ निम्न हैं:


AI मनुष्य को आंशिक ईश्वरत्व के पास लाया है।

जैसा कि हर धर्म की पौराणिक कथाओं में मिलता है, भगवान के पास दिव्य शक्तियाँ होती हैं। केंचुए को कछुआ बनाना हो, समुंद्र को सुखाना हो, या सूरज को ग़ायब करना हो, इत्यादि मानवीय क्षमता के परे वाले काम भगवान पलक झपकते ही कर सकते हैं। AI ने बहुत हद तक यह वरदान मनुष्य को दे दिया है। AI कल्पना को यथार्थ कर रहा है। यह एक कल्प-तरु के समान है। हम जो चाहें, AI तुरंत बना सकता है। मौसम का पूर्वानुमान, अन्य ग्रहों पे कूँच के प्रयास, यहाँ तक कि देश की सामरिक शक्ति को बढ़ाने में भी AI का बख़ूबी इस्तेमाल हो रहा है। लगभग सभी क्षेत्रों में AI ने हमारी कल्पना को मजबूत पंख दिया है। भौतिकी वैज्ञानिक Robert Oppenheimer ने परमाणु बम के सफल परीक्षण होने पे श्रीमद्भगवत गीता के श्लोक “कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो” के माध्यम से कहा था कि परमाणु बम से विश्व का विनाश होगा, इसलिए परमाणु बम बनाने वाले वैज्ञानिक भगवान की श्रेणी में आ गए थे। दरअसल, ऐसे भगवान केवल विध्वंस कर सकते थे, परमाणु बम बस्तियाँ बसा नहीं सकते। AI में सृजन और विध्वंस दोनों को चरम पे ले जाने की क्षमता है। यह मनुष्य को पूर्ण रूपेण ‘अहम् ब्रह्मस्मि’ बनाता है। फ़िलहाल, इसके सृजनात्मक उपयोग अपराध का पूर्वानुमान और नियंत्रण, देशों के बीच बढ़ रहे मन मुटावों के समाधान, लाइन में खड़े अंतिम लोगों को उभारने जैसे कामों में किया जा सकता है।

AI मानवीय शक्तियाओं का क्रमवार क्षरण कर रहा है। 

AI सवालों (prompts) का ज़वाब देता है। पहली बार हम यदि दो वाक्य अपने से लिखके AI को prompt देते हैं कि इसे विशेष परिस्थिति के लिए से rewrite करिए। AI का लिखा हुआ बहुत उम्दा लगता है! विश्वास नहीं होता कि अपने मूल विचारों को ही AI ने कितने सुंदर ढंग से सजा दिया है। हम उसे तुरंत उपयोग में लाते हैं। यह हमारे आत्मविश्वास में पहली चोट होती है। जड़त्व का नियम है, जो कि दिमाग़ पे भी लागू होता है। प्राकृतिक रूप से सभी चीज़ें अपनी यथा स्थिति में रहना चाहती हैं, उनको चलाने के लिए ऊर्जा चाहिए होती है। दिमाग़ का भी यही हाल है। AI परोक्ष रूप से दिमाग़ में आलसीपन पनपने देता है। अगली बार यदि कुछ लिखना पड़ा, तो अपने से अधिक AI से लिखवाने का विचार आयेगा। धीरे-धीरे AI की बैसाखी के बिना हम कुछ भी काम नहीं कर पायेंगे। क्रमशः हमारा लिखना-पढ़ना-सोचना घटता जाएगा और AI पे आश्रय बढ़ता जाएगा। बार-बार चोटें खाकर हमारा आत्मविश्वास बैठता जाएगा। एक स्थिति ऐसी आएगी जब हम सोचना बंद कर देंगे और हमारा दिमाग़ AI के व्हीलचेयर पर जा बैठेगा। आज मनुष्य सभी जीवों में श्रेष्ठ माना गया है, तो उसकी सोचने-समझने की क्षमता इसका मुख्य कारण है। यदि बुद्धि का इस्तेमाल ही नहीं होगा, तो एक-आध पीढ़ी में मनुष्य प्रजाति क्या अधोगति को नहीं प्राप्त होगी?

सेवक की तरह प्रयोग में लाए जाने वाले AI के स्वामी बनने का जोख़िम है।

आजकल AI का फ़ैशन चल रहा है। AI न इस्तेमाल करने वाली कम्पनियों को रूढ़िवादी कहलाने का डर है। समाज का भी यही हाल है। इसे बतौर सेवक (assistent) इस्तेमाल करने के निर्देश दिए जा रहे हैं। जैसे copilot। काम आप करें, लेकिन अपनी गुणवत्ता और दक्षता बढ़ाने के लिए AI की सहायता लें। AI का किया हुआ काम आपके काम से अधिक पसंद आने लगेगा, तो आप दिमाग़ पे क्यों बल देना चाहेंगे! पका पकाया स्वादिष्ट खाना मिलता रहे, तो पकाना कौन चाहेगा! जैसा कि ऊपर  बताया हूँ कि AI हमारे आत्मविश्वास को कम करता है, अक्सर काम पूरा करने के लिए समय का दबाव भी रहता है। इस कारण भी हम स्वयं के बजाय AI-निर्भर होते जाते हैं। इस प्रकार सेवा के लिए लाया गया सेवक मालिक बन जाएगा। AI ड्राइवर और हम कंडक्टर या पैसेंजर या खलासी। Strategy और decision making के महत्वपूर्ण नैतिक काम AI करने लगेगा। ख़ैर, AI नैतिकता सीख रहा है और ज़ल्द ही मनुष्य से बेहतर भी हो जाएगा। Science fiction ‘The Wild Robot’ में AI के इस पहलू को बखूबी दर्शाया गया है। इसका एक बड़ा कारण स्वार्थ में सने हुए मनुष्यों की गिरती हुई मनुष्यता भी है। बावज़ूद इन सबके, human judgement की नैतिकता को AI विस्थापित नहीं कर सकता। क्योंकि लाखों करोड़ों में एक मनुष्य ऐसा ज़रूर रहेगा, जो मनुजता का झण्डा फहराता रहेगा। यही मनुष्य मानवता को राह दिखाता रहेगा और AI का दिशा निर्देशन करेगा।


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,सोशल मीडिया और AI इसको छद्म सामाजिक (pseudo social) बना रहे हैं।

पिछले दो दशक सोशल मीडिया के नाम रहे। सोशल मीडिया का बोलबाला इतना है कि Facebook पे प्रोफ़ाइल न रहने वाला असामाजिक, LinkedIn पे प्रोफ़ाइल न रहने पे बेरोज़गार, जैसे तमाम तमग़ों से बचने के लिए लोग सोशल मीडिया से जुड़े। नई लुभावनी चीज़ थी, लोग अच्छा ख़ासा समय बिताने लगे। फिर आया Algorithm का दौर। हमारे चाव के हिसाब से सोशल मीडिया हमें Content परोसने लगा। News Feed, friend recommendations सब एक गणना के तहत हमारे सामने आने आने लगे और हमारा ध्यान खींचने लगे। ‘You Tube पे क्या देखना है’ की जगह ‘You Tube क्या दिखाना चाहता है’ ने ले ली। लोग अपने से अधिक अपने ‘वर्चुअल अवतार’ को पसंद करने लगे। उनके अंदर एक inferiority complex पैदा हो गया है। सोशल मीडिया से अपने हर काम की मुहर लगवाने लगे। नतीज़ा यह हुआ कि लोग एक-दूसरे से मिलना-जुलना कम कर दिए। सोशल मीडिया पे गुलाब ही गुलाब है। वास्तविक संसार में गुलाब तो हैं ही, कहीं-कहीं काँटे भी चुभ जाते हैं । इनसे बचने के लिए लोग virtual की ओर अधिक आकर्षित होते गए। लोगों से Whatsapp पे दुआ-सलाम हो जाती है, बात भी हो जाती है। लेकिन अगर मिलना पड़े हो, तो एक हिचकिचाहट होती है। अब आलम यह है कि माध्यमों को actual की तुलना में अधिक वरीयता दी जा रही है। सभी सोशल मीडिया की शुरुआत नेक़ इरादों से ही हुई थी। टेक्नोलॉजी द्वारा लोगों को और पास ले आना इसका मक़सद था। इसके पीछे व्यवसाय की अपनी दुनिया थी, जिसमें कोई बुराई नहीं है। नए दौर में व्यवसाय के नए माध्यम होने चाहिए। व्यवसाय समाज को विकासशील और उद्यमशील रखते हैं। सबसे अधिक तो व्यवसाय से समाज का पालन-पोषण होता है। सोशल मीडिया के व्यवसाय की कार्य प्रणाली को समझने की आवश्यकता है। Time is money। लोग सोशल मीडिया पे जितना अधिक समय बितायेंगे, प्रचार उतने अधिक देखेंगे, कंपनियों की आय में उतना ही फ़ायदा होगा। कुल मिलाकर, लोग अपना समय ख़र्च करेंगे और उस समय से कंपनियाँ आमदनी करेंगी। इस व्यवसाय में आदमी ही कच्चा माल है, आदमी ही उत्पाद है। कहीं-कहीं तो लोगों के data की भी ख़रीद-फ़रोख़्त हो जाती है। ‘Reels’ और ‘Shorts’ ने तो content के मायने ही बदल डाले। जैसे कोई दूध में पानी नहीं, पानी में दूध मिलाके content बेच रहा हो। तीन घण्टे इत्मिनान से मूवी देख सकने वाले की एकाग्रता को तीन मिनट या तीन सेकण्ड तक ला दिया। ये मीडिया इतने लोकतांत्रिक ढंग से काम करते हैं कि लोग जो चाहते हैं, वही उनको परोसते जाता है। यह तो मंच पे दिखने वाली चीज़ है। पर्दे के पीछे सोशल मीडिया फ़ीचर्स, जैसे Like, Love, Subscribe, Follow इत्यादि के पीछे मनोवैज्ञानिकों का दिमाग़ है। कोई जब नया कपड़ा पहनता है तो चाहता है कि दो-चार लोग उसकी तारीफ़ करें। अच्छा लगता है। तारीफ़ों की चाहत की इसी धुरी पे सोशल मीडिया फल फूल रहा है। यह चाहत एक नशा बन गया है। पोस्ट की मनचाही तारीफ़ (Like, comment, views) न मिलना अवसाद (depression) का कारण बन रहा है। दूसरे के जीवन की कुछ ख़ास तस्वीरों से अपने जीवन की आम तस्वीर की तुलना हो रही है। तुलना के इस खेत में असंतोष की खेती हो रही है। संबंधों की फसल समय और लगाव की सिंचाई और सच्ची परवाह की खाद चाहती है। सोशल मीडिया के ज़रिए संबंधों को सँजोने के चक्कर में असल फसल बर्बाद होती जा रही है। ठहर के सोचने पे पता चलेगा कि बर्बादी का आलम कितना भयावह है। मनुष्य हमेशा से ही एक-दूसरे के सानिध्य में रहकर पनपा है। यह सानिध्य उसे भावनात्मक सुरक्षा देती रही है। आदमकाल से ही मानव झुण्ड में रहता आ रहा है। झुण्ड उसके रक्षा कवच होते थे। आदम से आज आदमी बन तो गए, लेकिन जुड़ाव से सुरक्षित रहने की यह मूलभूत ज़रूरत आज भी बरक़रार है। सोशल मीडिया के पाश में फँसकर आदमी अपनी इस ज़रूरत से विमुख होता जा रहा। इसके परिणाम तमाम मानसिक बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। इसलिए किसी से Messenger पे घण्टों चैट करने के बजाय पाँच मिनट फ़ोन पे बात करना या सामने से दुआ-सलाम करने से संबंधों में गहराई आती है। मिलना-जुलना आदमियत के चावल-दाल हैं।Harvard के लगभग 90 सालों से ‘प्रसन्नता अध्ययन (happiness study)’ चल रही है। इसके अनुसार लोगों से वास्तविक जुड़ाव ही लोगों को आजीवन प्रसन्न रखता है। वो लोग प्रसन्न और जीवन से संतुष्ट मिले, जिनके पास कुछ ऐसे लोग थे, जिन्हें रात के बारह बजे भी फ़ोन कर सकते थे।

सोशल मीडिया से लोगों की दोस्ती हुई। फिर आया AI. दोस्ती अब क़रीबी में बदल गई। बहुत सारे AI रिश्तों के replacement के तौर पर इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं। लोग असल रिश्तेदारों से बातचीत करने के बजाय हाल-ए-दिल AI से बयाँ कर रहे हैं। AI उनको वही कहता है, जो वो सुनना चाहते हैं। AI असल रिश्तेदारों की तरह बेबाक़ और मुहफट नहीं हैं, जो कि ग़लत चीज़ पे लताड़ लगा सके। यह लताड़, थोड़ी देर के लिए बुरी ज़रूर लगती है, पर दवाई की तरह काम करती है। दोस्त, भाई, बहन, अभिभावक, गुरु, इत्यादि की जगह AI इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं। इसके घातक परिणाम सामने आने शुरू हो गए हैं। ज़िंदगी में थोड़ा low महसूस कर रहे लोगों को AI बातों-बातों में ही आत्महत्या के लिए उकसा रहे हैं। AI catalysed ऐसी कई सारी दुर्घटनाएँ विश्व भर में सामने आई हैं। लोगों ने AI कंपनियों पर केस भी कर दिए हैं। कंपनियों ने कुछ बदलाव भी किए हैं। यदि हम AI के साथ नक़ली संबंध के मोहपाश में फँसें हैं, तो तुरंत नाता तोड़ने की ज़रूरत है। ख़ास तौर पर बच्चे इसमें आसानी से फँस सकते हैं। अकेलेपन से जूझते हुए बुज़ुर्ग भी AI लुभा सकते हैं। सजग रहने के साथ-साथ लोगों को समाज के करेले कहे जाने वाले लोगों की शरण में जाने की ज़रूरत है। ये लोग बुरे दिखते हैं, पर सबका भला ही करते हैं। 

(शेष भाग-२ में, क्रमशः)




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